Friday, March 31, 2017

मां कांगड़ा ने किया था जालंधर दैत्य का संहार, तीन गुंबद की यह है मान्यता

नवरात्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है। आज नवरात्र का तीसरा दिन है। आज मां चंद्रघंटा का पूजन किया जा रहा है। नवरात्रों में वातावरण में एक अलग ही सुंगध और साकारत्मकता होती है, जो युवक या युवतियां व्रत रखते हैं और अपने अंदर कुछ अलग ही ऊर्जा को महसूस करते हैं। पंजाब केसरी इन नवरात्रों में मां के श्रद्धालुओं को शक्तिपीठों के दर्शन करवा रहा है। इसी कड़ी में आज हम आपको कांगड़ा के ब्रजरेश्वरी शक्तिपीठ मां के दर्शन करवा रहे हैं।
कांगड़ा का बज्रेश्वरी शक्तिपीठ मां का एक ऐसा धाम है, जहां पहुंच कर भक्तों का हर दुख उनकी तकलीफ मां की एक झलक भर देखने से दूर हो जाती है। यह 52 शक्तिपीठों में से मां का वो शक्तिपीठ जहां सती का दाहिना वक्ष गिरा था और जहां तीन धर्मों के प्रतीक के रूप में मां की तीन पिण्डियों की पूजा होती है। मां सती का बायां वक्षस्थल यहां गिरने से इसे स्तनपीठ भी कहा गया है। पहाड़ों को नहलाती सूर्य देव की पवित्र किरणें और भोर के आगमन पर सोने सी दमकती कांगड़ा की विशाल पर्वत श्रृंखला को देख ऐसा लगता है कि मानो किसी निपुण जौहरी ने घाटी पर सोने की चादर ही मढ़ दी हो। ऐसा मनोरम दृश्य कि एक पल को प्रकृति भी अपने इस रूप पर इतरा उठे।
मान्यता
मां बज्रेश्वरी देवी के धाम के बारे मे कहते हैं कि जब मां सती ने पिता के द्वारा किए गए शिव के अपमान से कुपित होकर अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे, तब क्रोधित शिव उनकी देह को लेकर पूरी सृष्टि में घूमे। शिव का क्रोध शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। शरीर के यह टुकड़े धरती पर जहां-जहां गिरे वह स्थान शक्तिपीठ कहलाया। मान्यता है कि यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था इसलिए ब्रजरेश्वरी शक्तिपीठ में मां के वक्ष की पूजा होती है। माता बज्रेश्वरी का यह शक्तिपीठ अपने आप में अनूठा और विशेष है क्योंकि यहां मात्र हिन्दू भक्त ही शीश नहीं झुकाते बल्कि मुस्लिम और सिख धर्म के श्रद्धालु भी इस धाम में आकर अपनी आस्था के फूल चढ़ाते हैं। कहते हैं ब्रजेश्वरी देवी मंदिर के तीन गुंबद इन तीन धर्मों के प्रतीक हैं। पहला हिन्दू धर्म का प्रतीक है, जिसकी आकृति मंदिर जैसी है तो दूसरा मुस्लिम समाज का और तीसरा गुंबद सिख संप्रदाय का प्रतीक है।
तीन पिण्डियों का महत्व
तीन गुंबद वाले और तीन संप्रदायों की आस्था का केंद्र कहे जाने वाले माता के इस धाम में मां की पिण्डियां भी तीन ही हैं। मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित यह पहली और मुख्य पिण्डी मां बज्रेश्वरी की है। दूसरी मां भद्रकाली और तीसरी और सबसे छोटी पिण्डी मां एकादशी की है। मां के इस शक्तिपीठ में ही उनके परम भक्त ध्यानु ने अपना शीश अर्पित किया था इसलिए मां के वो भक्त जो ध्यानु के अनुयायी भी हैं वो पीले रंग के वस्त्र धारण कर मंदिर में आते हैं और मां का दर्शन पूजन कर स्वयं को धन्य करते हैं। कहते हैं, जो भी भक्त मन में सच्ची श्रद्धा लेकर मां के इस दरबार में पहुंचता है उसकी कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती।
5 बार होती है मां की आरती
मां ब्रजेश्वरी देवी की इस शक्तिपीठ में प्रतिदिन मां की पांच बार आरती होती है। सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही सबसे पहले मां की शैय्या को उठाया जाता है। उसके बाद रात्रि के श्रृंगार में ही मां की मंगला आरती की जाती है। मंगला आरती के बाद मां का रात्रि श्रृंगार उतार कर उनकी तीनों पिण्डियों का जल, दूध, दही, घी, और शहद के पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। उसके बाद पीले चंदन से मां का श्रृंगार कर उन्हें नए वस्त्र और सोने के आभूषण पहनाएं जाते हैं। फिर चना पूरी, फल और मेवे का भोग लगाकर संपन्न होती है मां की प्रात: आरती।
दोपहर की आरती और भोग चढ़ाने की रस्म को गुप्त रखा जाता है। दोपहर की आरती के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, तब श्रद्धालु मंदिर परिसर में ही बने एक विशेष स्थान पर अपने बच्चों का मुंडन करवाते हैं। मंदिर परिसर में ही भगवान भैरव का भी मंदिर है, लेकिन इस मंदिर में महिलाओं का जाना पूर्ण रूप से वर्जित है। यहां विराजे भगवान भैरव की मूर्ति बड़ी ही खास है। कहते हैं जब भी कांगड़ा पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो इस मूर्ति की आंखों से आंसू और शरीर से पसीना निकलने लगता है। तब मंदिर के पुजारी विशाल हवन का आयोजन कर मां से आने वाली आपदा को टालने का निवेदन करते हैं और यह ब्रजेश्वरी शक्तिपीठ का चमत्कार और महिमा ही है कि आने वाली हर आपदा मां के आशीष से टल जाती है।
कहते हैं एकादशी के दिन चावल का प्रयोग नहीं किया जाता है, लेकिन इस शक्तिपीठ में मां एकादशी स्वयं मौजूद है इसलिए यहां भोग में चावल ही चढ़ाया जाता है। सूर्यास्त के बाद इन पिण्डियों को स्नान कराकर पंचामृत से इनका दोबारा अभिषेक किया जाता है। लाल चंदन, फूल व नए वस्त्र पहनाकर मां का श्रृंगार किया जाता है और इसके साथ ही सांय काल आरती संपन्न होती है। शाम की आरती का भोग भक्तों में प्रसाद रूप में बांटा जाता है। रात को मां की शयन आरती की जाती है, जब मंदिर के पुजारी मां की शैय्या तैयार कर मां की पूजा अर्चना करते हैं।
जालंधर राक्षस का मां ने किया था संहार
एक अन्य आख्यान के अनुसार जालंधर दैत्य की अधिवासित भूमि जालंधर पीठ पर ही देवी ने वज्रास्त्र के प्रहार से उसका वध किया था। इस दैव्य का वक्ष और कान का हिस्सा कांगड़ा की धरती पर गिरकर वज्र के समान कठोर हो गया था। उसी स्थान पर वज्रहस्ता देवी का प्राकट्य हुआ। वज्रवाहिनी देवी को शत्रुओं पर विजय पाने के लिए भी पूजा जाता रहा है। कहते हैं, जालंधर दैत्य का संहार करने पर माता की कोमल देह पर अनेक चोटें आ गई थीं। इसका उपचार देवताओं ने जख्मों पर घी लगाकर किया था। आज भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए संक्रांति को माता की पिण्डी पर पांच मन देसी घी, मक्खन चढ़ाया जाता है, उसी के ऊपर मेवे और फलों को रखा जाता है। यह भोग लगाने का सिलसिला सात दिन तक चलता है। फिर भोग को प्रतिदिन श्रद्धालुओं में प्रसाद स्वरूप बांट दिया जाता है।

नवरात्र में मिले ये संकेत, समझ जाएं समस्त ब्रहामाण्ड की शक्तियां हैं मेहरबान

चैत्र नवरात्र आरंभ होने के साथ शुरू हो जाता है, भक्तों में शक्ति को प्रसन्न करने का दौर। वैसे तो साल में चार बार नवरात्र आते हैं लेकिन चैत्र नवरात्र अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। पुराणों के अनुसार, कुछ ऐसे संकेत हैं, जिससे पता चलता है की धन की देवी के साथ समस्त ब्रहामाण्ड की शक्तियां आप पर मेहरबान हैं। शास्त्रों के अनुसार नवरात्र में कंजक पूजन का विशेष महत्व है। दो साल की कन्या से लेकर नौ वर्ष तक की कन्या को मां का स्वरूप माना जाता है। माना जाता है कि आहुति, उपहार, भेंट, पूजा-पाठ और दान से मां दुर्गा इतनी खुश नहीं होतीं, जितनी कंजक पूजन और लोंगड़ा पूजन से होती हैं। अपने भक्तों को सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करती हैं। 9 दिनों में कोई कंजक अपनी इच्छा से आपके हाथों में सिक्का थमा दें तो समझ जाएं निकट भविष्य में धन की देवी आपके घर में वास करने वाली हैं।
भारतीय संस्कृति में सोलह श्रृंगार को शुभता का संकेत माना गया है। जिस घर की महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, वहां सुख और समृद्धि अपना बसेरा बना कर वास करती है। नवरात्र में महिलाएं खास तौर पर सजती-संवरती हैं। जिस दिन आपको किसी ऐसी महिला के दर्शन हो जाएं जो सोलह श्रृंगार से सजी हो। उस दिन आपको हर काम में सफलता प्राप्त होगी।
सपने में कोई माचिस जलाता है, तो उसे ऐसी जगह से धन की प्राप्ति होती है जहां से कोई उम्मीद नहीं होती। यदि सपने में कोई चेक लिख कर दे तो इसका मतलब आपको विरासत में धन मिल सकता है तथा व्यवसाय में भी वृद्धि हो सकती है। सपने में कोई आप पर कानूनी मुकदमा चला रहा है, जिसमें वह निर्दोष छूट गया है तो उसे अतुल धन संपदा की प्राप्ति हो सकती है। किसी को धन उधार दे रहे हैं तो अत्यधिक धन की प्राप्ति हो सकती है।
सफेद गाय का दिखना अथवा घर के बाहर आना शुभ संकेत है।
सुबह के समय शंखनाद अथवा मंदिर की घंटियां सुनना, दिन सुहाना बनाता है।
यात्रा के आरंभ में हमें ब्राह्मण, घोड़ा, हाथी, फल, अन्न, दूध, दही, गौ, सरसों, कमल, श्वेत वस्त्र, मोर, जलपूर्ण कलश, मिट्टी, कन्या, रत्न, पगड़ी, बैल, संतान सहित स्त्री, मछली, पालकी दिखाई दे तो ये शुभ संकेत होते हैं।
यदि रात्रि को उल्लू के दर्शन हो जाएं तो इसका अर्थ है कि धन का नुक्सान होने वाला है लेकिन प्रात:काल उल्लू की आवाज सुनना मंगलकारी माना गया है। यदि किसी के आंगन में उल्लू मरा हुआ मिले तो यह उस घर में पारिवारिक कलह का सूचक है और यदि किसी विशेष स्थान पर उल्लू नियमित रूप से आने लगे तो इसे किसी भयानक व दुखदायी घटना का सूचक माना जाता है।


जानिए क्यों मां काली कहलाई चामुंडा देवी

नवरात्रों का पावन पर्व चल रहा है और आज मां के चतुर्थ रूप कूष्माण्डा की पूजा हो रही है। कूष्माण्डा माता का अर्थ है कि पूरा जगत उनके पैर में है। इन नवरात्रों में मां के श्रद्धालुओं को शक्तिपीठों के दर्शन कर रहा है। इसी कड़ी में आज मां चामुंडा देवी के दर्शन करवा रहे हैं। हिन्दू श्रद्धालुओं का मुख्य केंद्र और 51 शक्तिपीठों में एक चामुंडा देवी देव भूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है। बंकर नदी के तट पर बसा यह मंदिर महाकाली को समर्पित है। मान्यता है कि यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामना पूर्ण होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी स्थान पर माता सती का चरण गिरा था। देश के कोने-कोने से भक्त यहां पर आकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य बहुत अद्भुत है। मां काली बुराई का संहार करने वाली देवी हैं। मान्यता चामुंडा देवी मंदिर को चामुंडा नन्दिकेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि चामुंडा देवी मंदिर में ‘शिव और शक्ति’ का वास है। चामुंडा देवी के मंदिर के पास भगवान शिव विराजमान है जो कि नन्दिकेश्वर के नाम से जाने जाते है। चामुंडा देवी जी का मंदिर बाणगंगा (बानेर) नदी के किनारे पर स्थित है। नवराात्रि के त्यौहार के दौरान बड़ी संख्या में लोग दर्शनों के लिए मंदिर में आते है। चामुंडा देवी मंदिर भगवान शिव और शक्ति का स्थान है। भक्तों में मान्यता है कि यहां पर शतचंडी का पाठ सुनना और सुनाना मां की कृपा पाने के लिए सबसे सरल तरीका है और इसे सुनने और सुनाने वाले का सारे क्लेश दूर हो जाते हैं। मां काली चामुण्डा क्यों कहलाती हैं दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार चण्ड-मुण्ड नामक दो महादैत्य देवी से युद्ध करने आए तो देवी ने काली का रूप धारण कर उनका वध किया था। माता देवी की भृकुटी से उत्पन्न कलिका देवी ने जब चण्ड-मुण्ड के सिर देवी को उपहार स्वरुप भेंट किए तो देवी भगवती ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया कि तुमने चण्ड-मुण्ड का वध किया है, अतः आज से तुम संसार में चामुंडा के नाम से विख्यात होंगी। इसी कारण भक्तगण देवी के इस स्वरुप को चामुंडा रूप में पूजते हैं। मंदिर स्थापना की कथा लगभग 400 साल पहले एक राजा और ब्राह्मण पुजारी ने मंदिर को एक उचित स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए देवी मां से अनुमति मांगी। देवी मां ने इसकी सहमति देने के लिए पुजारी को सपने में दर्शन दिए और एक निश्चित स्थान पर खुदाई करने निर्देश दिया। खुदाई के स्थान पर एक प्राचीन चामुंडा देवी मूर्ति पाई गई। चामुंडा देवी की मूर्ति को उसी स्थान पर स्थापित किया गया और उसकी उसी रूप में पूजा की जाने लगी। कहते हैं जब पुजारी ने राजा को अपने स्वप्न के बारे में बताया तो राजा ने मूर्ति को बाहर निकालने के लिए कुछ पुरुषों को लगाया लेकिन इतने सारे पुरुष भी मिलकर माता की मूर्ति को हिला नहीं पाए। इस सब काफी निराश हुए। मां ने फिर से पुजारी को दर्शन दिए और कहा कि मेरी मूर्ति को वो एक साधारण पत्थर समझ कर उसे बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं इसलिए तुम सुबह जल्दी उठकर स्नान कर और शुद्ध वस्त्र पहन कर सम्मानजनक अगर उस मूर्ति को बाहर निकालोगे तो तुम अकेले ही उसे उठा सकते हो। पुजारी ने वैसा ही किया तो सभी हैरान रह गए, इस पर पुजारी ने मां की शक्ति के बारे में सबको बताया। आज भी मां चामुंडा देवी में विराजमान है।

https://youtu.be/NTcfWLW3Hyk