हमारे कुछ मित्रों ने पूछा कि क्या हिन्दू और आर्य अलग होते हैं या एक ही तो हमने दोनों का विभाजन मान्सिक आधार पर माना है । आप भी पढ़ें और अंतर जानिए :-
हिन्दू की मान्यताएँ :-
• मूर्तीपूजा करना ठीक है ।
• भूत प्रेत होते हैं ।
• पूजा ही तो करनी है किसी की भी पूजा करलो । मन में श्रद्धा होनी चाहिए बस !
• गंगा स्नान से पाप मिट जाते हैं ।
• शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से महादेव प्रसन्न होते हैं ।
• सारे संस्कृत के हमारे ग्रंथ प्रमाणिक हैं ।
• भगवान विष्णु युग युग में प्रकट होते हैं और नष्ट होते धर्म की पुनः स्थापना करते हैं ।
• हमारी संस्कृति हमें अहिंसा सिखाती है । तभी हमने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया । इसलिए कोई हमपर वार करे तो हमें अहिंसा ही करनी चाहिए ।
• सब धर्म अच्छे हैं ।
• हमेे अपनी सभ्यता पर गर्व है । हमने बहुत सी लुप्त होती संस्कृतियों को अपने यहाँ आश्रय दिया ।
• हमें अनेकता में एकता वाले संस्कारों पर गर्व है ।
• हम हिन्दू हैं, हमारी भाषा हिन्दी और हमारा देश हिन्दुस्तान है ।
• कोई भी धर्म आपस में लड़ना नहीं सिखाता ।
• भूत प्रेत होते हैं ।
• पूजा ही तो करनी है किसी की भी पूजा करलो । मन में श्रद्धा होनी चाहिए बस !
• गंगा स्नान से पाप मिट जाते हैं ।
• शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से महादेव प्रसन्न होते हैं ।
• सारे संस्कृत के हमारे ग्रंथ प्रमाणिक हैं ।
• भगवान विष्णु युग युग में प्रकट होते हैं और नष्ट होते धर्म की पुनः स्थापना करते हैं ।
• हमारी संस्कृति हमें अहिंसा सिखाती है । तभी हमने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया । इसलिए कोई हमपर वार करे तो हमें अहिंसा ही करनी चाहिए ।
• सब धर्म अच्छे हैं ।
• हमेे अपनी सभ्यता पर गर्व है । हमने बहुत सी लुप्त होती संस्कृतियों को अपने यहाँ आश्रय दिया ।
• हमें अनेकता में एकता वाले संस्कारों पर गर्व है ।
• हम हिन्दू हैं, हमारी भाषा हिन्दी और हमारा देश हिन्दुस्तान है ।
• कोई भी धर्म आपस में लड़ना नहीं सिखाता ।
अार्य की मान्यताएँ :-
• निराकर ईश्वर को समेटकर काल्पनिक प्रतिमा की उपासना करने से लाभ नहीं होता बल्कि मूर्ती कला से शिल्प विद्या को अवश्य बढ़ाया जा सकता है ।
• भूत वर्तमान काल की समाप्ती को कहते हैं, प्रेत मृत शरीर को कहते हैं , मान्सिक उन्माद जिनको लोग भूत प्रेत कहकर डरते रहते हैं उनका अस्तित्व नहीं होता ।
• उपासना तो केवल उपास्य की ही करनी चाहिए न कि किसी की भी ! तभी अनेकों देवी देवता गढ़कर भी तथाकथित हिन्दू मुसलमान पीरों की मज़ारों और पीर खानों तक जा पहुँचा । और उपासना की विधी केवल पातंजल योगाभ्यास ( प्राणायाम, ध्यान आदि ) ही है दूसरी कोई नहीं ।
• गंगास्नान से शरीर की मैल दूर होती है ।
• शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से दूध बर्बाद होता है । खाद्य शदार्थों को पत्थरों पर अर्पण करने से कोई लाभ नहीं है ।
• संस्कृत के वही शास्त्र प्रमाणिक हैं जो ईश्वरीय वेद वाणी के अनुकूल हैं । बाकी सब भ्रष्ट हैं जो मिलावटी ग्रंथ वैदिक धर्म की गरिमा को समाप्त करने हेतु लिखे गए हैं ।
• विराट ईश्वर मुट्ठीभर शरीर में सिमटकर पृथिवी पर अवतार नहीं लेता बल्कि जीवात्मा अवतार ( पुनर्जन्म ) लेता है । यदि शिवाजी, प्रताप, सूरजमल आदि भी अवतार की प्रतीक्षा करते तो हो जाती धर्म की रक्षा ।
• हमारी संस्कृति हमें अहिंसा तो सिखाती है पर नपुंसकता नहीं । किसी पर दया दिखाना तभी उचित है जब सामने वाला आपकी दया के योग्य हो अन्यथा उसे क्षमा करके अपने लिए संकट पैदा नहीं करना चाहिए । तभी हमारे राजा निकृष्ट मलेच्छों पर दया दिखाते रहे और बदले में वे नीच हमारी प्रजा को रौंदते रहे । दया का ये अर्थ नहीं कि तुम अपनी भी रक्षा न करो । और हमने सदैव धर्म स्थापना हेतु चक्रवर्ती राज्य ही किया है । तभी वैदिक शासन पूरी पृथिवी पर स्थिर रहा । अशोक की बौद्धिक नपुंसकता ( बौद्ध मत की अंहिसा ) के कारण राष्ट्र निर्बल हुआ और आक्रमणकारीयों द्वारा रौंदा गया । और अब तक सामान्य स्थिति में नहीं आया है ।
• धर्म कहते हैं उच्च नैतिक आचरण को जिसमें ब्रह्मचर्य, सत्यभाषण, चोरी त्याग पवित्रता आदि । और इसके विपरीत तो अधर्म ही कहलाता है । तो सभी धर्म अच्छे हैं वाली धारणा ही गलत है । क्योंकि धर्म तो एक है । यदि सांप्रदायों को धर्म कहा जाता है तो गलत है । संप्रदाय तो मानवी फूट का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं ।
• ये विशुद्ध गप्प है कि हमने सभी संस्कृतियों को अपने यहाँ आश्रय दिया । बल्कि वे विदेशी लोग बलपूर्वक, अधिकारपूर्वक आपकी जमीन पर आकर बैठे हैं जिनको आप अबतक निकाल नहीं पाए हैं ।
• अनेकता में कभी भी एकता नहीं होती । तभी आए दिन सांप्रदाईक दंगे और कलेश सामने आते रहते हैं । एक से विचारों में ही एकता होती है । एकता तब होगी जब पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक सबके रीति रिवाज एक, भाषा एक, और एक संस्कृति होगी । अन्यथा एकता दिवास्वप्न ही रहेगी ।
• हम आर्य हैं, हमारी भाषा लौकिक- वैदिक संस्कृत है, हमारा देश आर्यावर्त है ।
• धर्म तो पवित्रता धारण करना सिखाता है और समाज में होते अत्याचार से मुक्ति दिलाने हेतु संघर्ष करना सिखाता है । लेकिन मत मतांतर या संप्रदाय लड़ने भिड़ने के लिए ही बनाए जाते हैं । इनका उद्देश्य अपने आप को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करके उनपर शासन करने का होता है ।
• भूत वर्तमान काल की समाप्ती को कहते हैं, प्रेत मृत शरीर को कहते हैं , मान्सिक उन्माद जिनको लोग भूत प्रेत कहकर डरते रहते हैं उनका अस्तित्व नहीं होता ।
• उपासना तो केवल उपास्य की ही करनी चाहिए न कि किसी की भी ! तभी अनेकों देवी देवता गढ़कर भी तथाकथित हिन्दू मुसलमान पीरों की मज़ारों और पीर खानों तक जा पहुँचा । और उपासना की विधी केवल पातंजल योगाभ्यास ( प्राणायाम, ध्यान आदि ) ही है दूसरी कोई नहीं ।
• गंगास्नान से शरीर की मैल दूर होती है ।
• शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से दूध बर्बाद होता है । खाद्य शदार्थों को पत्थरों पर अर्पण करने से कोई लाभ नहीं है ।
• संस्कृत के वही शास्त्र प्रमाणिक हैं जो ईश्वरीय वेद वाणी के अनुकूल हैं । बाकी सब भ्रष्ट हैं जो मिलावटी ग्रंथ वैदिक धर्म की गरिमा को समाप्त करने हेतु लिखे गए हैं ।
• विराट ईश्वर मुट्ठीभर शरीर में सिमटकर पृथिवी पर अवतार नहीं लेता बल्कि जीवात्मा अवतार ( पुनर्जन्म ) लेता है । यदि शिवाजी, प्रताप, सूरजमल आदि भी अवतार की प्रतीक्षा करते तो हो जाती धर्म की रक्षा ।
• हमारी संस्कृति हमें अहिंसा तो सिखाती है पर नपुंसकता नहीं । किसी पर दया दिखाना तभी उचित है जब सामने वाला आपकी दया के योग्य हो अन्यथा उसे क्षमा करके अपने लिए संकट पैदा नहीं करना चाहिए । तभी हमारे राजा निकृष्ट मलेच्छों पर दया दिखाते रहे और बदले में वे नीच हमारी प्रजा को रौंदते रहे । दया का ये अर्थ नहीं कि तुम अपनी भी रक्षा न करो । और हमने सदैव धर्म स्थापना हेतु चक्रवर्ती राज्य ही किया है । तभी वैदिक शासन पूरी पृथिवी पर स्थिर रहा । अशोक की बौद्धिक नपुंसकता ( बौद्ध मत की अंहिसा ) के कारण राष्ट्र निर्बल हुआ और आक्रमणकारीयों द्वारा रौंदा गया । और अब तक सामान्य स्थिति में नहीं आया है ।
• धर्म कहते हैं उच्च नैतिक आचरण को जिसमें ब्रह्मचर्य, सत्यभाषण, चोरी त्याग पवित्रता आदि । और इसके विपरीत तो अधर्म ही कहलाता है । तो सभी धर्म अच्छे हैं वाली धारणा ही गलत है । क्योंकि धर्म तो एक है । यदि सांप्रदायों को धर्म कहा जाता है तो गलत है । संप्रदाय तो मानवी फूट का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं ।
• ये विशुद्ध गप्प है कि हमने सभी संस्कृतियों को अपने यहाँ आश्रय दिया । बल्कि वे विदेशी लोग बलपूर्वक, अधिकारपूर्वक आपकी जमीन पर आकर बैठे हैं जिनको आप अबतक निकाल नहीं पाए हैं ।
• अनेकता में कभी भी एकता नहीं होती । तभी आए दिन सांप्रदाईक दंगे और कलेश सामने आते रहते हैं । एक से विचारों में ही एकता होती है । एकता तब होगी जब पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक सबके रीति रिवाज एक, भाषा एक, और एक संस्कृति होगी । अन्यथा एकता दिवास्वप्न ही रहेगी ।
• हम आर्य हैं, हमारी भाषा लौकिक- वैदिक संस्कृत है, हमारा देश आर्यावर्त है ।
• धर्म तो पवित्रता धारण करना सिखाता है और समाज में होते अत्याचार से मुक्ति दिलाने हेतु संघर्ष करना सिखाता है । लेकिन मत मतांतर या संप्रदाय लड़ने भिड़ने के लिए ही बनाए जाते हैं । इनका उद्देश्य अपने आप को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करके उनपर शासन करने का होता है ।
ये मुख्य भेद आज के तथाकथित सनातनी हिन्दू और आर्य समाज की विचारधारा रखने वाले व्यक्ति के हैं ।
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