Tuesday, April 4, 2017

सपने सुहाने लड़कपन के, मेरी आँखों में घूमे बहार बनके

हर फ़िक्र से आज़ाद थे, खुशियाँ इक़ट्ठी होती थीं ;

वो दिन भी क्या दिन थे, जब अपनी भी गर्मियों की छुट्टी होती थीं...!!!

वो सब दोस्तों का जंगल में जाना,
गाय भैंस चराना,
कभी हलवा तो कभी पकौड़े बनाना,
शाम को घास या चूल्हे में जलाने के लिए लकड़ियों का गट्ठर भी लाना,
घर आकर अम्मा पर एहसान जताना,
कि "मैं थकी गया"

दूसरे दिन सुबह फिर जंगल जाना।

ना व्हाट्सएप्प था ना फेसबुक,

"अपनी ही जिंदगी होती थी और अपना ही नशा दोस्ती का, एन्जॉयमेंट का"

"हर फिक्र से मुक्त, जिंदगी एंटरटेनमेंट से युक्त"

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