सम्राट अशोक भी प्रभावित थे रूपनाथ बहोरीबंद के वैभव से
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बहोरीबंद का ऐतिहासिक स्थल भी उपेक्षा का शिकार
कटनी। जिले में वैभवशाली स्थानों की कोई कमी नहीं। अब से कई सौ वर्ष पहले इन स्थानों पर शायद यह वैभव दमकता रहा होगा लेकिन शनै: शनै: इसे भुला दिया गया। अब तो आलम यह है कि इन पुरा सम्पदा को महज एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में घोषित कर शासन-प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली। जिले की इन्हीं खास ऐतिहासिक धरोहरों में से एक बहोरीबंद के समीप रूपनाथ । रूपनाथ अपने नाम के अनुरूप धार्मिक आस्था का केन्द्र है। जहां भगवान भोलेनाथ का प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर है। यह तीर्थस्थल बहोरीबंद से 5 किमी. दूर है। भगवान शिव की पंचलिंग की आकर्षक प्रतिमा यहीं स्थापित है। यहां पहाड़ पर एक-दूसर के ऊपर बने तीन कुंड देखे जा सकते हैं। सबसे निचले कुंड को लक्ष्मणकुंड, बीच के कुंड को सीता कुंड और सबसे ऊपर वाले कुंड को राम कुंड के नाम से जाना जाता है। बहोरीबंद क्षेत्र में रूपनाथ एक प्रमुख श्रद्धा और आस्था का केन्द्र है। आसपास के ग्राम वासी पूरे पठार क्षेत्र में भवगान शिव की कृपा होना मानते हैं..
💥🚩 *सम्राट अशोक का लघु शिलालेख बनाता है*
इसे अतिमहत्वपूर्ण
रूपनाथ में मौर्य शासक अशोक का लघु शिलालेख सं.1 यहाँ एक चट्टान पर उत्कीर्ण है। लेख में अशोक यह दावा करते हैं कि उसके धम्म प्रचार के फलस्वरूप भारत के निवासी अपने नैतिक आचरण के कारण देवताओं से मिल गये हैं। वैसे इस शिलालेख की भाषा आम समझ में नहीं आती लेकिन इसका पुरातत्व विभाग ने इसका रूपांतर किया है। हालांकि यह भी ज्यादा पुष्ट नहीं लेकिन लिखे रूपांतर के अनुसार सम्राट अशोक ने यहां स्वयं इस स्थान को महत्वपूण्र माना है। दरअसल सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म तथा मध्यप्रदेश का रिस्ता गहरा है। कहा जाता है कि अशोक ने उज्ज्यनी अर्थात उज्जैन जाते वक्त संभवत: रूपनाथ पहुंचे थे। यहां के लोगों का मनना है कि यही वह महत्वूपर्ण शिलालेख है जिसे स्वयं अशोक ने संपादित किया था हालांकि इसके प्रमाण नहीं ।
💥🚩 *देश में अशोक के शिलालेख*
अशोक के लघु शिलालेख चौदह शिलालेखों के मुख्य वर्ग में सम्मिलित नहीं है जिसे लघु शिलालेख कहा जाता है । ये निम्नांकित स्थानों से प्राप्त हुए हैं।
बैराट- राजस्थान के जयपुर जिले में।
यह शिलाफलक कलकत्ता संग्रहालय में है।
रूपनाथ- बहोरीबंद तहसील कटनी जिले में
मस्की -रायचूर जिला कर्नाटक।
गुजर्रा -दतिया जिला मध्य प्रदेश।
राजुलमंडगिरि-बल्लारी जिला कर्नाटक।
सहसराम -शाहाबाद जिला बिहार।
गाधीमठ- रायचूर जिला कर्नाटक।
पल्किगुंडु- गवीमट के पास, रायचूर, कर्नाटक।
ब्रह्मगिरि- चित्रदुर्ग जिला कर्नाटक।
सिद्धपुर -चित्रदुर्ग जिला कर्नाटक।
जटिंगा रामेश्वर-चित्रदुर्ग जिला कर्नाटक।
येर्रागुडी-कर्नूल जिला आंध्र प्रदेश।
दिल्ली-अमर कॉलोनी, दिल्ली।
अहरौरा-मिर्ज़ापुर जिला उत्तर प्रदेश।
ये सभी लघु-शिलालेख अशोक ने अपने राजकर्मचारियों को संबोधित करके लिखवाए हैं। अशोक ने सबसे पहले लघु-शिलालेख ही खुदवाए थे, इसलिए इनकी शैली उसके अन्य लेखों से कुछ भिन्न है।
इन शिलालेखों का उद्देश्य धर्म को लोकप्रिय बनाने के लिए अशोक ने मानव व पशु जाति के कल्याण हेतु पशु-पक्षियों की हत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । राज्य तथा विदेशी राज्यों में भी मानव तथा पशु के लिए अलग चिकित्सा की व्यवस्था की । अशोक के महान पुण्य का कार्य एवं स्वर्ग प्राप्ति का उपदेश बौद्ध ग्रन्थ संयुक्त निकाय में दिया गया है । अशोक ने दूर-दूर तक बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु दूतों, प्रचारकों को विदेशों में भेजा अपने दूसरे तथा 13वें शिलालेख में उसने उन देशों का नाम लिखवाया जहाँ दूत भेजे गये थे ।
सम्राट अशोक और मध्यप्रदेश
अशोक को वर्तमान मध्यप्रदेश का जमाई कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं दरअसल लेखों में उपजलब्ध जानकारी के अनुसार राजगद्दी प्राप्त होने के बाद अशोक को अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ करने में चार वर्ष लगे । इस कारण राज्यारोहण चार साल बाद 269 ई. पू. में हुआ था । वह 273 ई. पू. में सिंहासन पर बैठा । अभिलेखों में उसे देवाना प्रिय एवं राजा आदि उपाधियों से सम्बोधित किया गया है । मास्की तथा गर्जरा के लेखों में उसका नाम अशोक तथा पुराणों में उसे अशोक वर्धन कहा गया है । सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने 99 भाइयों की हत्या करके राज सिंहासन प्राप्त किया था, लेकिन इस उत्तराधिकार के लिए कोई स्वतंत्र प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है । दिव्यादान में अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी है, जो चम्पा के एक ब्राह्मण की पुत्री थी । सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार उज्जयिनी जाते समय अशोक विदिशा में रुके जहाँ उन्होंने श्रेष्ठी की पुत्री देवी से विवाह किया जिससे महेन्द्र और संघमित्रा का जन्म हुआ । दिव्यादान में उनकी एक पत्नी का नाम तिष्यरक्षिता मिलता है । उनके लेख में केवल उसकी पत्नी् का नाम करूणावकि है जो तीवर की माता थी । बौद्ध परम्परा एवं कथाओं के अनुसार बिन्दुसार अशोक को राजा नहीं बनाकर सुसीम को सिंहासन पर बैठाना चाहता था, लेकिन अशोक एवं बड़े भाई सुसीम के बीच युद्ध की चर्चा है
यही वह समय था जब रूपनाथ और सम्राट समीप आए।
💥🚩 *धार्मिक मान्यता: भगवान राम ने किया था अल्प प्रवास*
रूपनाथ में तीन कुण्ड हैं। सबसे नीचे लक्ष्मण कुण्ड उसके उपर सीता कुण्ड और सबसे उपर राम कुण्ड। इन कुण्ड की सुंदरता देखते बनती है, लेकिन सवाल यह उठता है कि इनका कुण्ड का नाम भगवान राम सीता और लक्ष्मण ही क्यों पड़ा । क्विदंती है कि राम बनवास के दौरान यहां भवगान श्री राम का अल्प प्रवास हुआ था जिसके बाद से ही यह भूमि सुंदर हुई। इन्ही कुण्ड के समीप में भगवान ने सीता माता और लक्ष्मण के साथ कुछ वक्त बिताया जिसके बाद से इनका नाम राम, सीता तथा लक्ष्मण कुण्ड के रूप में पहचाना जाने लगा।
💥🚩 *भगवान शिव के बांदकपुर जाने कि कथा.*
भगवान शिव के बांदकपुर जाने की क्विदंती भी प्रचलित
रूपनाथ बहोरीबंद के कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि रूपनाथ एक बेहद सुंदर भगवान शिव का स्थान था जो स्वयं शिव को अच्छा लगता था लेकिन इस स्थान पर भगवान की पूजा पाठ ठीक से नहीं होती थी जिसके बाद भगवान संभवत: रूठ कर समीप बांदकपुर चले गए और तब से इसके वैभव को ठेस पहुंची। हालांकि इसका शास्त्रों में कोई प्रमाण नहीं लेकिन कुछ लोग इसलिए इसे सत्य मानते हैं क्योंकि मौर्य शासन में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाते इसके प्रचार-प्रसार में अपना सब कुछ लगा दिया था। लोगों की मान्यता है कि शायद यही वह समय रहा होगा जब भगवान शिव की पूजा पाठ में कमी रही होगी? वैसे भी अशोक का शिलालेख बताता है कि यहां सम्राट का प्रभाव काफी रहा होगा।
💥🚩 *पुरातत्व का संरक्षण, कैसे हो रूपनाथ का विकास*
वैभवशाली रूप में पूरे महाकोशल में सिर्फ रूपनाथ ही एक मात्र स्थान ऐसा है जहां अशोक के मौर्यवश्ं का प्रमाण मिलता है। लिहाजा इस स्थान को पुरातत्व विभाग ने अपने अधिपत्य में ले लिया है। इस स्थान को राष्ट्रीय संरक्षित धरोहर के रूप मे घोषित किया गया है, लेकिन पुरातत्व विभाग का अधिपत्य इसके विकास में रोड़ा बना है। दरअसल इस स्थान से 3 सौ मीटर के दूरी तक बिना पुरातत्व विभाग की अनुमति कोई कुछ भी नहीं कर सकता ऐसे में न तो स्थानीय संस्था और न ही निजी तौर पर कोई कुछ भी करने की अनुमति ले पाता। जिसके बाद इस स्थान पर विकास नहीं हो पाया। साफ-सफाई का आभाव साफ देखा जा सकता है। संरक्षित क्षेत्र की बाउंड्रीवाल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुकी है। महज एक पुरातत्व विभाग के कर्मचारी के हवाले इस क्षेत्र के देख-रेख की जिम्मेदारी हैं। बिजली के लिए सौर उर्जा लेम्प लगे हैं जिनमे अक्सर खराबी आ जाती है। स्थानीय ग्राम पंचायत का कहना है कि वह चाह कर भी इस क्षेत्र में कुछ नहीं कर पाती। क्योंकि उसे पुरातत्व विभाग की अनुमति लेनी पड़ती है तो काफी जटिल प्रकिया है।
बनसकता महाकोशल का शिक्षाप्रद पर्यटन स्थल
जिस स्थान पर ईश्वी से 232 वर्ष पूर्व का शिलालेख लगा हो वह स्थान अपने आप में कितना महत्वपूर्ण है। यह जाहिर सी बात है, लेकिन इस स्थान को भी अन्य धरोहरों की तरह भुला दिया गया। सम्राट अशोक के मौर्य साम्राज्य को दर्शित इस स्थान पर एक ऐसा शिक्षाप्रद पर्यटन स्थल बन सकता है जहां खोज कर्ता, विद्यार्थी तथा देश विदेश के जिज्ञासु सैलानी आकर भारत की प्राचाीन सभ्यता का अवलोकन कर सकते हैं। माना जाता है कि झिंझरी के प्राग ऐतिहासिक काल के भित्ती चित्र के बाद सबसे पुराना यह शिलालेख रूपनाथ मे मौजूद है। यही नहीं इस स्थान पर आने-जाने की भी सुलभता है। बावजूद इस स्थान को विकसित किये जाने में किसी की रूचि नहीं । कटनी ही नहीं जबलपुर जिले के जानकारों को इस दिशा में सार्थक पहल करते सम्राट अशोक के शिलालेख और भगवान शिव के सुंदर स्थान के लिए विकास की कार्य योजना बनानी चाहिए।
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